परमात्मा की प्राप्ति के बाद ही मन में शांति एवं आनंद संभव: निरंकारी राजपिता रमित जी
रिपोर्ट :- अजय रावत
यमुना विहार :- संसार में चारों ओर एक न रुकने वाली दौड़, शोर और हलचल दिखाई देती है। इन परिस्थितियों के बीच मानव शांति एवं आनंद की तलाश करता है, जबकि वास्तविक शांति तभी संभव है जब जीवन में परमात्मा की प्राप्ति हो। यह प्राप्ति सतगुरु द्वारा प्रदान किए गए ब्रह्मज्ञान के माध्यम से ही संभव है।’’ यह उद्गार निरंकारी राजपिता रमित जी ने यमुना विहार स्थित संत निरंकारी सत्संग भवन में आयोजित संत समागम में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
निरंकारी राजपिता जी ने उदाहरण सहित समझाया कि जिस प्रकार बाहर सड़क पर ट्रैफिक, भीड़ और शोर अपनी जगह बना रहता है, परंतु सत्संग के शांत वातावरण में प्रवेश करते ही मन की अवस्था बदल जाती है, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होने पर मानव का अंतर्मन बदल जाता है और निराकार परमात्मा से जुड़ जाता है। फिर जीवन में शांति एवं आनंद का संचार होने लगता है। हमारा जीवन मानवीय मूल्यों एवं गुणों को अपनाते हुए सेवा, सुमिरन और सत्संग को महत्व देता है तथा सतगुरु की शिक्षाओं पर चलने का प्रयास करता है।
निरंकारी राजपिता जी ने कहा कि सांसारिक पदार्थों और मोह-माया से मन को मुक्त करके ही अविनाशी एवं अनमोल दौलत रूपी परमात्मा की प्राप्ति संभव है। संसार की सभी वस्तुएं और उपलब्धियां यहीं रह जानी हैं। केवल निरंकार के एहसास से ही जीवन का कल्याण संभव है।
स्थानीय संयोजक रोशन देहलवी ने निरंकारी राजपिता जी का स्वागत करते हुए उपस्थित श्रद्धालुओं एवं स्थानीय सरकारी निकायों से प्राप्त सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।