◼️यज्ञोपवीत विद्याअध्ययन करने, यज्ञ करने व तीन ऋणों से मुक्त होने की प्रतिज्ञा लेने का संस्कार हैः आचार्य विष्णुमित्र वेदार्थी
रिपोर्ट :- अजय रावत
गाजियाबाद :- आर्यसमाज राजनगर, के तत्त्वावधान में आयोजित सात दिवसीय वेद प्रचार सप्ताह के प्रथम दिन सोमवार को यज्ञ, भजन व वेदोपदेश के कार्यक्रम हुए। पहले दिन बडी संख्या में लोगों ने भाग लिया। वैदिक आचार्य विष्णुमित्र वेदार्थी ने कहा कि श्रावणी मास की पूर्णिमा के दिन विशेष स्वाध्याय का आरम्भ करना श्रावणी उपाकर्म पर्व कहलाता है। स्वाध्याय का यह अनुष्ठान पौष मास तक चलता है। इस दौरान सत्य नियमों को धारण कर व्रती बनने के लिये नवीन यज्ञोपवीत धारण कर मन में विशेष ऊर्जा व उत्साह का संचार किया जाता है। यज्ञोपवीत विद्याअध्ययन करने, यज्ञ करने व तीन ऋणों से मुक्त होने की प्रतिज्ञा लेने का संस्कार है।
उन्होंने कहा कि उपनयन संस्कार में मुख्य कर्म यज्ञोपवीत का धारण करना होता है। बालक जब विद्या ग्रहण करने का इच्छुक हो और पढ़ने में भी समर्थ हो जाये तब उसका यज्ञोपवीत संस्कार करा देना चाहिये। यह संस्कार बालक को द्विज बनाने के लिये किया जाता है। जिस मनुष्य को दूसरा जन्म प्राप्त हो जाये उसे द्विज कहते हैं। पहला जन्म बालक को माता पिता से प्राप्त होता है तो दूसरा जन्म उसे आचार्य व विद्या से मिलता है। उपनयन संस्कार में माता पिता द्वारा यह घोषणा होती है कि हमने बालक को भौतिक जीवन प्रदान करके उसे बाल्यकाल में जो शिक्षा व संस्कार देने सम्भव थे, वे दे दिये हैं। अब हम अपने बालक को विशेषज्ञ आचार्यों के हाथों में सौंपना चाहते हैं , जिससे कि वह विद्वान् बनकर अपने जीवन के ध्येय धर्म, अर्थ व मोक्ष को प्राप्त हो सके। बालक को विद्याअध्ययन करने के लिये आचार्य के समीप ले जाना उपनयन संस्कार कहलाता है ।
पाठशाला में शिष्य को गुरु के इतना निकट आ जाना चाहिये कि वह गुरु के मन के अनुरूप एकमन वाला हो जाये। आर्य भजनोपदेशक पण्डित भीष्म आर्य ने भजनो से सभी का मन मोह लिया। यज्ञ के यजमान ज्ञानेन्द्र आत्रेय व आशा आत्रेय रहे। आर्यसमाज राजनगर के मंत्री सत्यवीर चौधरी ने सभी का स्वागत किया। श्रद्धानंद शर्मा, डॉ वीरेंद्र नाथ सरदाना, मोती लाल गर्ग, सुभाष चंद्र गुप्ता आदि ने विशेष योगदान दिया।