बैसाखी का पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि यह आध्यात्मिक जागृति, वीरता और सामुदायिक एकता का प्रतीक हैः सरदार बलप्रीत सिंह


◼️वर्ष 1699 में ही गुरू गोविंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी 



रिपोर्ट :- अजय रावत 

गाजियाबाद :- भारतीय जनता पार्टी अल्पसंख्यक मोर्चा के महानगर अध्यक्ष सरदार बलप्रीत सिंह ने ने सभी शहरवासियों को बैसाखी पर्व की बधाई व शुभकामनाएं दीं। उन्होंने वाहे गुरू से सभी के सुख-समृद्धि व मंगल की अरदास भी की। सरदार बलप्रीत सिंह ने कहा कि बैसाखी का पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि यह आध्यात्मिक जागृति, वीरता और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। सिख धर्म के लिए बैसाखी का दिन सबसे पवित्र माना जाता है, क्योंकि इसी दिन 1699 में दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी। उन्होंने जाति-पाति के भेदभाव को खत्म कर मानवता और समानता का संदेश दिया था। गुरु जी ने सबसे पहले पांच स्वयंसेवकों को अमृतपान कराकर खालसा बनाया, जिन्हें पंच प्यारे कहा गया।

खालसा पंथ की स्थापना का उद्देश्य अत्याचार के विरुद्ध लड़ना और समानता व न्याय को बढ़ावा देना था। खालसा सदस्य पांच ककार केश, कंघा, कड़ा, कृपाण व कछहरा धारण करते हैं। खालसाश् शब्द का अर्थ है शुद्ध या निर्मल, जो सीधे ईश्वर से जुड़े। यह  खालिस यानि शुद्ध अनुयायियों को दर्शाता है। सरदार बलप्रीत सिंह ने कहा कि  खालसा पंथ का सृजन 10 गुरुओं के प्रशिक्षण और शिक्षा पर आधारित है। गुरु गोविंद सिंह जी महाराज चाहते थे कि हर सिख हर रूप में भक्ति और शक्ति से परिपूर्ण हो। उनके मुख्य सिद्धांतों में दान और तेग, तलवारद्ध शामिल हैं। उन्होंने सिखों में त्याग, ईमानदारी, स्वच्छताए दान और साहस जैसे गुण उत्पन्न किए। 

उनके बनाए नियम के तहत तलवार का इस्तेमाल खालसा सिर्फ आपात स्थिति में ही करेगा। सभी शांतिपूर्ण प्रयास विफल होने के बाद ही तलवार खींची जा सकती है। इसका इस्तेमाल आत्मरक्षा और पीड़ितों की रक्षा करने के लिए ही किया जा सकता है।

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