यूजीसी एक्ट के विरोध में अमरण अनशन पर बैठीं महाकाली डॉ. उदिता त्यागी, पुलिस व स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही पर भड़के डॉ. बी. पी. त्यागी




रिपोर्ट :- अजय रावत 

गाजियाबाद :- हर्ष ईएनटी हॉस्पिटल के चेयरमैन और देश के जाने-माने ईएनटी सर्जन डॉ. बी. पी. त्यागी ने यूजीसी एक्ट के विरोध में महाकाली डॉ. उदिता त्यागी द्वारा किए जा रहे अमरण अनशन को लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने इसे “हिंदुओं का डेथ वारंट” बताते हुए कहा कि यह केवल एक कानून का विरोध नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक संरचना पर सीधा प्रहार है।

डॉ. बी. पी. त्यागी ने गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि महाकाली डॉ. उदिता त्यागी बीते कई समय से अमरण अनशन पर बैठी हैं, लेकिन उनके स्वास्थ्य को लेकर गाजियाबाद स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह लापरवाह नजर आ रहा है। अब तक उनके मेडिकल चेकअप के लिए स्वास्थ्य विभाग की कोई भी टीम मौके पर नहीं पहुंची है, जो प्रशासनिक संवेदनहीनता का गंभीर उदाहरण है।

उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति देश, समाज और संस्कृति के लिए अपने जीवन की परवाह किए बिना संघर्ष कर रहा हो, तब प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग का यह कर्तव्य बनता है कि उसकी स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करे, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठे हैं। यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि मानवाधिकारों के प्रति भी गंभीर उपेक्षा है।

डॉ. बी. पी. त्यागी ने चेतावनी देते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि शीघ्र ही गाजियाबाद स्वास्थ्य विभाग की मेडिकल टीम महाकाली डॉ. उदिता त्यागी के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए मौके पर नहीं पहुंची, तो यह मामला केवल चिकित्सा लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले लेगा। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन की जिम्मेदारी पूरी तरह प्रशासन और संबंधित विभागों की होगी।

उन्होंने यह भी कहा कि देश के जागरूक नागरिक, समाजसेवी संगठन, धार्मिक संस्थाएं और सामाजिक कार्यकर्ता इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं और यदि सरकार तथा प्रशासन ने संवेदनशीलता नहीं दिखाई, तो यह विरोध आंदोलन व्यापक स्तर पर फैल सकता है।

डॉ. बी. पी. त्यागी ने सरकार से मांग की कि यूजीसी एक्ट को लेकर उठ रही जनभावनाओं को गंभीरता से सुना जाए, संवाद का रास्ता अपनाया जाए और आंदोलनरत लोगों के स्वास्थ्य व सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार मौलिक अधिकार है और जब विरोध शांतिपूर्ण तरीके से हो रहा हो, तो उसकी अनदेखी करना न केवल अलोकतांत्रिक है, बल्कि सामाजिक असंतोष को और अधिक बढ़ाने वाला कदम है।

यह मामला अब केवल एक अनशन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक संवेदनशीलता, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी की बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है। अगर समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो इसके दूरगामी सामाजिक और राजनीतिक परिणाम सामने आ सकते हैं।

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