नवरात्रि पर्व में कलश स्थापना का बहुत अधिक महत्व हैः आचार्य दीपक तेजस्वी


◼️कलश स्थापना शुभ मुहूर्त या अभिजीत मुहूर्त में ही करें



रिपोर्ट :- अजय रावत 

गाजियाबाद :- एस्ट्रोज्ञानम रिसर्च सेंटर के चेयरमैन, ज्योतिषाचार्य एवम् वास्तुविद आचार्य दीपक तेजस्वी ने कहा कि चैत्र नवरात्रि हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला प्रमुख पर्व है। इसमें देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन  कलश स्थापना के बाद ही पूजा-पाठ की शुरूआत होती है। करने का विधान है, जो चौत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर किया जाएगा। चैत्र मास की शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6 बजकर 52 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 20 मार्च की सुबह 4 बजकर 52 मिनट पर होगा। कलश स्थापना कर का शुभ मुहूर्त सुबह 06.52 से  07.43 तक रहेगा। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12.05 बजे से दोपहर 12.53 तक है।  

आचार्य दीपक तेजस्वी ने कहा कि दुर्गा माता की असीम कृपा पाने के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ जरूर करना चाहिए। नवरात्रि पूजा की सामग्री में मिट्टी का पात्र, जौ, मिट्टी, जल से भरा हुआ कलश, मौली, इलायची, लौंग, कपूर, रोली, साबुत सुपारी, साबुत चावल, सिक्के, अशोक या आम के पांच पत्ते, नारियल, चुनरी, सिंदूर, फल-फूल, फूलों की माला और श्रृंगार पिटारी होनी चाहिए। जिस स्थान पर कलश स्थापना करनी हो, स स्थान को पहले गंगाजल से शुद्ध करना चाहिए। कलश मिट्टी या धातु का हों और उसके नीचे बालू की वेदी बनानी चाहिए। ज्योतिष के अनुसार जब नवरात्र गुरुवार या शुक्रवार से शुरू होते हैं, तो मां दुर्गा का आगमन पालकी (डोली) पर माना जाता है। साल 2026 में नवरात्र गुरुवार से शुरू हो रहे हैं, इसलिए इस बार मां दुर्गा का आगमन पालकी में होगा। पालकी पर मां के आगमन को बदलाव व नई परिस्थितियों का संकेत माना जाता है।

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